इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के जनरल हाउस की बैठक 24.03.2025 को हुई। बैठक की अध्यक्षता श्री अनिल तिवारी (वरिष्ठ अधिवक्ता) और बार एसोसिएशन के अन्य निर्वाचित पदाधिकारियों ने की और इसमें सैकड़ों अधिवक्ताओं ने भाग लिया। बार एसोसिएशन ने न्यायाधीश श्री यशवंत वर्मा के इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरण के संबंध में हाल ही में कॉलेजियम की सिफारिश की निंदा की। माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा, न्यायाधीशों द्वारा इन-हाउस जांच कराने के कदम की सराहना के साथ-साथ, बार एसोसिएशन ने इन-हाउस जांच पर चिंता जताई है, जिसे उन्होंने ‘न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों का न्याय’ करने के रूप में संदर्भित किया है।
विचार-विमर्श-
बार एसोसिएशन ने एक कानूनी मुद्दा उठाया है कि न्यायाधीश श्री यशवंत वर्मा के बंगले से मिली नकदी लैटिन कहावत ‘रेस इप्सा लोक्विटर’ (Res iipsa loquitor) से पुष्ट होती है। जिससे तात्पर्य है की परिस्थितियाँ स्वयं बोलती हैं। बार एसोसिएशन ने एक कानूनी चिंता भी जताई है कि, “यह कानून का एक प्रमुख सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति अपने मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार निर्धारित किया है, इसलिए न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों का न्याय करना और न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करना इस आंतरिक जांच को संदिग्ध बनाता है और कानूनी महकमे के लिए अस्वीकार्य है।’ पुनः आगे कहा गया कि, “एक तरफ नौकरशाहों और राजनेताओं और दूसरी तरफ न्यायाधीशों के बीच अंतर या भेदभाव क्यों होना चाहिए। भ्रष्टाचार के आरोपों की स्थिति में दोनों को एक ही आपराधिक कार्यवाही के अधीन किया जाना चाहिए।”
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पहले ही दोषी न्यायाधीश को मूल इलाहाबाद उच्च न्यायालय या इसकी लखनऊ पीठ में स्थानांतरित करने के प्रस्तावित प्रस्ताव के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज करा दिया है। बार एसोसिएशन ने कहा है, “इलाहाबाद उच्च न्यायालय भ्रष्ट और दागी न्यायाधीशों का डंपिंग ग्राउंड नहीं है, जिसका बार एसोसिएशन पूर्ण बल से विरोध करता है।”
यह भी मांग की गई है कि 2014 में न्यायाधीश की पदोन्नति के बाद से न्यायाधीश द्वारा दिए गए सभी फैसलों की जांच की जानी चाहिए। इसके बाद महाभियोग की भी सिफारिश की गई है।
प्रस्ताव-
- हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने न्यायाधीश के प्रस्तावित स्थानांतरण का विरोध किया है।
- मुख्य न्यायाधीश को एफआईआर दर्ज करने और सीबीआई/ईडी या अन्य एजेंसियों द्वारा जांच की अनुमति देनी चाहिए।
- मुख्य न्यायाधीश को तुरंत न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की सिफारिश करनी चाहिए।
- न्यायाधीश की नियुक्ति के बाद से उनके सभी निर्णयों की समीक्षा की जानी चाहिए।
- कॉलेजियम में अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है।
- “अंकल जज सिंड्रोम” के बारे में चिंताएं व्यक्त की गई हैं।
- “भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र” का नारा भी बुलंद किया गया है।